संसार एक परीक्षा स्थल है परन्तु इसमें दुःख एक जटिल प्रश्न है ।।

संसार एक परीक्षा स्थल है परन्तु इसमें दुःख एक जटिल प्रश्न है ।। World is a test site but sadness is a complex question

मित्रों, यह तो सर्वविदित है, कि यह संसार एक परीक्षा स्थल है । परन्तु इस संसार में मनुष्य के नाना प्रकार के दुःख एक जटिल प्रश्न है । और इस प्रश्न का हल किसी साधारण संसारी के पास नहीं मिलता ।।

इस परीक्षा मेँ आत्मबल का ज्ञाता कोई सत्पुरुष ही वो भी अनुमान के आधार पर ही इस प्रश्न के सही उत्तर तक पहुँच पाता है । अपनी साधना और अपनी तीव्र बुद्धि के बल से इस प्रश्न को हल कर लेता है ।।

अर्थात संसार मेँ दुःख ही ऐसा साधन हैँ जो मनुष्य के कर्त्तव्य पालन और लक्ष्य की प्राप्ति के लिए विवस कर देता है । लेकिन जो दुःखों से डर जाता है वह संसार मेँ होने वाली जीवन की परीक्षा मेँ असफल हो जाता है ।।

 

भगवान कृष्ण ने जब माता कुन्ती से माँगने को कहा, तब माता कुन्ती कहती हैं –

विपदः सन्तु नः शश्वत्तत्र तत्र जगद्गुरो।
भवतो दर्शनं यत्स्यादपुनर्भवदर्शनम्।।2।।

हे जगद्गुरो ! हमारे जीवन में सदा-सर्वदा पग-पग पर विपत्तियाँ आती रहें, क्योंकि विपत्तियों में ही निश्चित रूप से आपके दर्शन हुआ करते हैं । और आपके दर्शन हो जाने पर फिर जन्म-मृत्यु की प्राप्ति नहीं होती ।।

कितनी अद्भुत बात है न ? एक दिन, दो दिन की विपत्ति में लोग घबरा जाते हैं । और यहाँ कुन्ती वरदान माँगती हैं, कि सदा सर्वदा मुझको विपत्ति का वरदान दो क्यों? इसलिए कि विपत्तिग्रस्त होकर हम आपको याद करती हैं । आपकी याद करना यही तो जीवन का सार है ।।

 

हनुमान जी महाराज ने कहा-

कह हनुमंत बिपति प्रभु सोई । जब तब सुमिरन भजन न होई।।3।।

ठीक ही है-

विपदो नैव विपदः सम्पदो नैव सम्पदः ।
विपद्विस्मरणं विष्णोः सम्पन्नारायणस्मृतिः ।।

दुनियाँ की विपत्ति कोई विपत्ति नहीं है । दुनियाँ की सम्पत्ति कोई सम्पत्ति नहीं है । भगवान का विस्मरण ही विपत्ति है । भगवान का स्मरण ही सर्वोत्कृष्ट सम्पत्ति है । यह समझ करके महापुरुषों ने विपत्ति का वरदान माँगा है ।।

दुनियाँ में कोई दूसरा दृष्टान्त नहीं है, जिसने वरदान माँगा हो विपत्ति का । एकमात्र कुन्ती का यह दृष्टान्त है जिसने वरदान माँगा विपत्ति का । कुन्ती बड़ी तत्त्वविदुषी महिला है ।।

 

कुन्ती कहती है- आपका आविर्भाव क्यों होता है?

तथा परमहंसाना मुनीनाममलात्मनाम् ।
भक्तियोगविधानार्थ कथं पश्येम हि स्त्रियः।।4।।

भगवन् ! जो अमलात्मा परमहंस मुनि हैं, उनकी भक्ति योग का विधान करने के लिए आपका अवतार होता है । परन्तु हम स्त्रियाँ इस रहस्य को कैसे समझ सकती हैं । निराकार निर्विकार अद्वैत अनन्त अखण्ड निर्गुण सच्चिदानन्दघन परात्पर परब्रह्म सगुण साकार रूप धारण कर लें, इसकी क्या आवश्यकता?

किन्तु जो सत्पुरुष आत्मबल पर विश्वास करता है वह दुःखो से घबराता नहीँ है । अनुमान करता है, सोचता है, विचार एवं मनन करता है, इन दुःखों को सदैव के लिये दूर करने का उपाय खोजता है ।।

ऐसा ही महापुरुष संसार के लिये एक आदर्श बन जाता है । जब वह दुःखों का सामना करते हुए आगे बढ़ता है । और अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेता है । वह संसार की परीक्षा मेँ सफल हो जाता है ।।

।। जय जय श्री राधे ।।

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जय श्रीमन्नारायण ।।
।। नमों नारायण ।।

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Swami Dhananjay Maharaj

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