सत्संग की महिमा ! श्रीमद्भागवत कथा – तृतीय स्कन्ध – अट्ठारहवाँ अध्याय ।।

सत्संग की महिमा ! श्रीमद्भागवत कथा – तृतीय स्कन्ध – अट्ठारहवाँ अध्याय ।। Satsang ki Mahima Bhagwat Puran 3 Skandh 18 Adhyay

जय श्रीमन्नारायण,

तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।।
भगवत्सङ्गिसङ्गस्य मर्त्यानां किमुताशिषः ।।

भागवत के इसी श्लोक का भावार्थ है ये गोस्वामी जी का दोहा जो उन्होंने लंकिनी से हमारे प्रिय हनुमान जी के लिए कहलवाया है ।।

तात स्वर्ग अपवर्ग सुख धरिय तुला एक अंग ।
तुल न ताहि सकल मिली जो सुख लव सत्संग ।।

अट्ठारहवें अध्याय में जब हिरण्याक्ष दिग्विजय कर लेता है तो उसे लगता है, की वो सम्पूर्ण सृष्टि का स्वामी बन गया । अक्सर ऐसा ही होता है हमारे साथ भी जब हम कुछ धन और प्रतिष्ठा पा लेते हैं । लेकिन इस थोड़े से प्रतिष्ठा और धन का वही मूल्य है जो एक ग्लास पानी का समुद्र के सामने है ।।

मानस में गोस्वामी जी ने कहा की रोम-रोम प्रति लागे कोटि-कोटि ब्रह्मण्ड ।।

अब सोंचने वाली बात ये है, कि अगर एक मनुष्य के शरीर में करोड़ों रोयें होते हैं, तो भगवान के शरीर में इससे कम तो नहीं होंगे ? और अगर कम से कम सौ भी होंगे तो प्रति रोम कूप में करोड़ो ब्रह्माण्ड हैं गोस्वामी जी के अनुसार । तो हमें तो करोड़ो जन्म लेने पड़ेंगे की हमारा वाला रोम कूप कौन सा है जिसमें हमारा ब्रह्माण्ड है ? और अगर रोम कूप मिल भी जाय तो उसमें भी करोड़ों ब्रह्माण्ड हैं ।।

अब फिर से हमें करोड़ों जन्म लेने पड़ेंगे अपना ब्रह्माण्ड ढूंढने में । और अगर कदाचित् हमारा ब्रह्माण्ड हमें मिल भी जाय तो एक ब्रह्माण्ड में तीन लोक हैं जिसमें पाताल लोक सात है, भूलोक सात है, भुवर्लोक सात है ।।

करोड़ों की संख्या में पृथ्वी है एक ब्रह्माण्ड में अब हम किस पृथ्वी पर रहते हैं ये ढूंढने में करोड़ों जन्म फिर से लेने पड़ेंगें । अब अगर पृथ्वी भी लाखों करोड़ों जन्म के बाद अरबों खरबों योनियों में भटकने के बाद अगर मिल भी जाय तो ये पृथ्वी कितनी बड़ी है और हम कितने स्थान को जानते अथवा कितने में रहते हैं ? ये है हमारी औकात ।।

फिर काहे का अहंकार ? थोड़ी सी धन और थोड़ी सी प्रतिष्ठा हमें भगवान और भक्ति से तो दूर रखती ही है बल्कि हमारे जितने में हम हैं उससे भी नीचे गिराने के लिए पर्याप्त है । इसलिए जो श्रद्धा का विषय है उसे श्रद्धा का ही विषय रहने दें तो हमें लगता है हमारा कल्याण अवश्य ही होगा ।।

अब ये हिरण्याक्ष अपने अहंकार में पृथ्वी को ही उठाकर पाताल में ले गया । मनु जी की उत्पत्ति हुई उनसे ब्रह्माजी ने कहा बेटा अब मैथुनी सृष्टि का आरम्भ करो । मनु जी ने कहा लेकिन मैं करूँ कहाँ ? पृथ्वी तो है नहीं । ब्रह्मा जी की नासिका से भगवान वाराह का अवतार हुआ ।।

दृष्टोऽङ्गुष्ठशिरोमात्रः क्षणाद्गण्डशिलासमः ।। अध्याय – १३, श्लोक २२वाँ.

क्षण मात्र में विशाल हो गए और हिरण्याक्ष ने जहाँ पृथ्वी को छुपा रखा था लाने के लिए चल पड़े । हिरण्याक्ष जा रहा था रास्ते से, तो उसे खुजली हो राही थी लड़ने की । लेकिन कोई दिख नहीं रहा था तभी नारद जी दिखे । सोंचा चलो आज इसी से काम चला लेते हैं ।।

नारदजी को पकड़ लिया बोला मुझे तुम्हारे साथ लड़ना है । नारद जी ने कहा – भाई मैं तो ब्राह्मण हूँ, मुझे लड़ाई-झगड़ा नहीं आता । तो बोला कोई ऐसा बताओ जिसके साथ मैं लड़ सकूँ । क्यों ? क्योंकि मेरे बाजुओं में खुजली हो राही है ।।

नारद जी ने कहा – देखो एक वाराह तुम्हारी पृथ्वी को लेकर जा रहा है । जाओ तुम्हारे बाजुओं की खुजली ऐसी मिटेगी की दुबारा कभी होगी ही नहीं ।।

अब हिरण्याक्ष दौड़ पड़ा लड़ने के लिए । वहां जाकर तरह-तरह की व्यंगात्मक बातें करे । क्योंकि लड़ने के लिए तो कोई न कोई बहाना चाहिए लेकिन भगवान उसकी बातों को अनदेखा करके चलते रहे ।।

तब उसने कहा – कि तुम तो एक जंगली जानवर हो । और किसी जंगली जानवर की क्या औकात जो हमारे साथ युद्ध कर सके । भगवान ने कहा भईया अब तो ये हद ही कर दिया अब लगता है की इसे सबक सिखाना ही पड़ेगा ।।

Hiranyaksha Bhagwan

श्रीभगवानुवाच:-

सत्यं वयं भो वनगोचरा मृगा युष्मद्विधान्मृगये ग्रामसिंहान् ।।
न मृत्युपाशैः प्रतिमुक्तस्य वीरा विकत्थनं तव गृह्णन्त्यभद्र ।।१०।।

अर्थ:- अरे ! सचमुच ही हम जंगली जीव हैं, जो तुम जैसे ग्राम सिंहों (कुत्तों) को ढूंढते फिरते हैं ।।

दुष्ट ! वीर पुरुष तुझ जैसे मृत्यु पाश में बंधे हुए अभागे जीवों की आत्मश्लाघा पर ध्यान नहीं देते ।।१०।।

अब तो हिरण्याक्ष ने कहा – कुत्ता बोलता है, महाराज दोनों में भयंकर युद्ध छिड़ गया और अंत में भगवान ने उसे मृत्यु के देवता यम के हवाले कर ही दिया । लेकिन उससे पहले युद्ध के समय एक बार तो हिरण्याक्ष ने भगवान के हाथों से गदा ही नीचे गिरा दिया । अब इस युद्ध कुशलता को देख आकास में खड़े देवता डर गए और किसी की जय – जयकार नहीं की ।।

किसी ने पूछा क्यों ? भगवान तो देवताओं के लिए लड़ रहे थे तो देवताओं को तो उनकी जय-जयकार करनी ही चाहिए । एक संत ने कहा – देवता अत्यंत स्वार्थी होते हैं । सोंचा अगर हिरण्याक्ष की जय-जयकार करेंगे तो फिर देवता नहीं रह पायेंगे अगर भगवान ने उसे मार डाला तो । और अगर हिरण्याक्ष जित गया और हमने अगर भगवान की जय-जयकार करी तो हिरण्याक्ष हमें जीने नहीं देगा ।।

संसय और स्वार्थ देवताओं में कूट-कूटकर भरे होते हैं । इसीलिए तो ये सदैव परेशान ही रहते हैं । ऐसे हजारों कथाएं आपको हमारे ग्रंथों में मिल जाएँगी जिसमें अपना काम निकलने के बाद देवताओं ने भगवान का भी विरोध किया है ।।

Swami Dhananjay Maharaj

और अंत में जब भगवान ने हिरण्याक्ष को मार डाला तब जितं जितं ते$जित विश्वभावन – आदि श्लोकों से स्तुति की और भगवान ने मनु को पृथ्वी सौंप दिया फिर मनु महाराज ने हम जैसे मनुष्यों को उत्पन्न किया इसीलिए हम मनु की संतान मानव हैं ।।

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जयतु संस्कृतम् जयतु भारतम् ।।

।। नमों नारायण ।।

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