About Shri Vaishnav Sampraday

”श्री वैष्णव सम्प्रदाय” एक परिचय ।। About Shri Vaishnav Sampraday

लक्ष्मीनाथ समारम्भां नाथयामुन मध्यमां ।।
अस्मदाचार्य पर्यन्तां बन्दे गुरुपरंपरां ।।

“श्री संप्रदाय” भागवत जी में परमादरणीय श्री शुकदेव जी महाराज ने, तथा अन्य संतों के द्वारा भी बताया गया है, की “विष्णो: इदं वैष्णवं” अर्थात् जो विष्णु हैं, वैष्णव भी वही हैं” । वैष्णवों की महिमा अनंतानंत गाई गयी है, लगभग सभी शास्त्रों में । और साथ ही ये भी कहा गया है, कि लक्ष्मी चाहिए, तो विष्णु अथवा वैष्णवों की शरण ग्रहण करो । अपने आमदनी का दशांस भी किसी श्रेष्ठ वैष्णव ब्राह्मण को ही दान करना चाहिए ।।

”श्री वैष्णव” के नाम से प्रसिद्ध ये संप्रदाय ”श्री संप्रदाय” है । क्योंकि इसकी आद्य प्रवर्तिका माता श्री महालक्ष्मी माता जी हैं । इस सम्प्रदाय की परम्परा के प्रथम आचार्य भगवान नारायण हैं । उनके बाद श्री नाथ मुनि, यामुनाचार्य (आलवन्दार) व रामानुज को ”मुनि जय” कहा जाने लगा ।।

 

आचार्य परंपरा:-About Shri Vaishnav Sampraday १. लक्ष्मी नारायण भगवान् ।।
२. विष्वक्सेन ।।
३. शठकोप स्वामी जी महाराज ।।
४. श्री श्रीनाथ स्वामीजी महाराज ।।
५. श्री यामुनाचार्य स्वामीजी महाराज ।।
६. श्री महापूर्ण स्वामीजी महाराज ।।
७. श्री रामानुजाचार्य स्वामीजी महाराज ।।
८. श्री गोविन्दाचार्य स्वामीजी महाराज ।।
९. श्री वेदांत देशीक स्वामीजी महारज ।।
१०. श्री लोकाचार्य स्वामी जी महाराज ।।
११. श्री वर वर मुनि स्वामीजी महाराज ।।
१२. श्री कांची प्रतिवादी भयंकर स्वामीजी महाराज ।।
१३. श्री श्रीनिवासाचार्य स्वामीजी महाराज ।।
१४. श्री बड़े अनन्ताचार्य स्वामीजी महाराज ।।
१५. श्री गादी अन्नाताचार्य स्वामीजी महाराज ।।
१६. श्री विष्वक्सेन त्रिदंडी स्वामी जी महाराज ।।
१७. श्री देवनयाकाचार्य स्वामीजी महाराज ।।
१८. श्री राजगोपालाचार्य स्वामीजी महाराज ।।

यह परंपरा श्री पति पीठ की है, और इसी क्रम में ही श्री लक्ष्मी प्रप्पन जीयर स्वामी जी महाराज हैं ।।

 

 jagadacharya sri tridandi swami ji maharaj

 

श्री पति पीठ के संस्थापक श्री श्रीपति स्वामी जी महाराज, जो बड़े अन्नाताचार्य स्वामीजी महाराज के शिष्य थे, हैं ।।

श्रीमद्जगद्गुरुरामानुजाचार्य यतीन्द्र स्वामी श्रीरामनारायणाचार्य स्वामीजी महाराज कोसलेशसदन अयोध्या, ये भी हमारी वैष्णवी परंपरा के एक प्रसिद्द आचार्य रहे हैं ।।

श्रीरामानुजाचार्य एक उच्चकोटि के वैष्णवाचार्य थे । उनका जन्म वैशाख शुक्ल षष्ठी को दक्षिण के तिरुकुदूर नामक स्थान पर हुआ । इनके पिता श्री केशव भट्ट थे । रामानुज भगवान श्री संकर्षण के अवतार माने जाते हैं । इनका भक्ति सिद्धान्त ”विशिष्टा द्वैत” के नाम से प्रसिद्ध है । उनका गीता तथा ब्रह्मसूत्र पर लिखा भाष्य ”श्री भाष्य” कहलाता है, और इनके द्वारा विकसित श्री संप्रदाय ही ”श्री वैष्णव सम्प्रदाय” के रूप मे आज प्रचलित है ।।

यामुनाचार्य, रामानुज के परम गुरु थे । जब रामानुज बहुत छोटे थे, तो इनके पिता का देहान्त हो गया । फिर उन्होंने काञ्ची में जाकर यादवप्रकाश नामक गुरु से वेदाध्ययन किया । अपनी कुशाग्र बुद्धि के बल पर वे गुरु के वक्तव्यों में ही दोष निकाल देते थे । उनकी इस आदत के कारण उनके गुरु भी उनसे ईर्ष्या करने लगे ।।

रामानुज बड़े ही विद्वान, उदार, धैर्यवान और सदाचारी थे । भक्ति मार्ग का प्रचार करते हुए उन्होंने बताया, कि भगवान पुरुषोत्तम ही प्रत्येक शरीर में साक्षी रूप में विद्यमान हैं । अपने अहंकार को त्यागकर भगवान की सर्वतोभावेन शरण ग्रहण करना ही जीव का परम पुरुषार्थ है । भगवान लक्ष्मी-नारायण जगत के माता-पिता हैं, और सभी जीव उनकी संतान हैं । अत: माता-पिता का प्रेम व उनकी कृपा प्राप्त करना ही संतान का परम धर्म है ।।

वाणी से उनका नाम लेना और मन-वाणी एवं शरीर से उनकी ही सेवा करनी चाहिए । भगवान के इस दासत्व की प्राप्ति ही मुक्ति है । भगवान सर्वान्तर्यामी, अनन्तानन्त, कर्मफल दाता तथा सृष्टिकर्ता और सद्गुणों के सागर हैं । अत: सर्वस्व निवेदन के रूप में शरणा-भक्ति ही भगवान की प्रसन्नता का प्रधान साधन है । अत: रामानुज ने दैन्य भाव की प्रतिष्ठा की है । उन्होंने अपनी रचना शरणागत गद्य, श्री रङ्ग गद्य तथा बैकुण्ठ गद्य (गद्यत्रय) में प्रेमा भक्ति का विस्तृत वर्णन किया है ।।

रामानुजाचार्य ने अपने कृत्यों तथा व्यवहार में प्रेम, सहिष्णुता, शरणागति, उत्साह, समदर्शिता तथा उदारता का परिचय दिया है । अपने ईष्ट देव के प्रति समर्पण के लिए उन्होंने अपने गृहस्थ जीवन को भी त्याग दिया, क्योंकि वे इसे अपने उद्देश्यों की पूर्ति में बाधा मानते थे । श्री रङ्गम् जाकर उन्होंने यतिराज नामक संन्यासी से संन्यास की दीक्षा ली । उनके गुरु यादव प्रकाश भी उनके पास आ गए । रामानुज ने तिरुकोट्टियूर के महात्मा नाम्बि से अष्टाक्षर मन्त्र (ॐ नमो नारायणाय) की भी दीक्षा ली ।।

महात्मा नाम्बि ने इस मन्त्र को देने के बाद उन्हें इस मन्त्र को गुप्त रखने का आदेश दिया । कहा ये मन्त्र बड़ा ही शक्तिशाली है, किसी को भी सुनने मात्र से मुक्ति दे देता है । किन्तु रामानुज ने सभी वर्गों के लोगों को बुलाकर वह मन्त्र सुना दिया । नाम्बि उनसे रुष्ट हो गए और क्रोधित होकर कहा, तुमने मन्त्र को गुप्त न रखकर अपराध किया है, जिसके बदले तुम्हें नरक भोगना पड़ेगा । इस पर रामानुज ने सविनय उत्तर दिया, भगवन् ! यदि इस मन्त्र का उच्चारण करके हजारों व्यक्ति नरक की यन्त्रणा से बच सकते हैं, तो मुझे नरक भोगने में आनन्द ही मिलेगा । उनके इस उत्तर से गुरु नाम्बि का क्रोध शान्त हो गया ।।

रामानुज भक्ति, चरित्रबल तथा विद्वता में भी अद्वितीय थे । इन्हें कुछ योग सिद्धियां भी प्राप्त थीं, और इनके बल पर उन्होंने काञ्ची नगर की राजकुमारी को प्रेत बाधा से मुक्त कर दिया । जब महात्मा आलवन्दार (यामुनाचार्य) मृत्यु शैय्या पर थे, तो उन्होंने रामानुज को अपने पास बुलाया किन्तु रामानुज के श्री रङ्गम् पहुंचने से पहले ही उन्होंने प्राण त्याग दिए । रामानुज ने देखा कि उनके हाथ की तीन उंगलियां मुड़ी हुई हैं । इसका कारण कोई न जान सका किंतु रामानुज समझ गए, कि यह संकेत उनके लिए है, जिसे वे मृत्यु से पहले बताना चाहते थे ।।

उन्होंने अनुमान लगाया, कि यामुनाचार्य मेरे द्वारा ब्रह्मसूत्र, विष्णु सहस्रनाम और आलवन्दारों के ग्रन्थ का ”दिव्य प्रबन्धम्” की टीका करवाना चाहते हैं । फिर उन्होंने उनके मृत शरीर को प्रणाम किया और कहा, भगवन् ! मुझे आपकी आज्ञा शिरोधार्य है । मैं इन तीनों ग्रन्थों की टीका लिखूंगा । उनके ऐसा कहते ही आलवन्दार की तीनों उंगलियां सीधी हो गईं । तत्पश्चात् रामानुज उनके प्रधान शिष्य पेरियनाम्बि से विधिपूर्वक वैष्णव दीक्षा लेकर भक्ति मार्ग में लीन हो गए ।।

उन्होंने वेदान्त सूत्रों पर लिखा ”श्री भाष्य” सबसे पहले कश्मीर के विद्वानों को सुनाया । इनके प्रधान शिष्य का नाम कूरत्तावलार (कुरेश) था । उनके दो पुत्रों से रामानुज ने विष्णु सहस्त्रनाम तथा दिव्य प्रबन्धम् की टीका लिखवाई । रामानुजाचार्य ने कई मंदिरों का निर्माण तथा पुन: निर्माण करवाया ।।

श्री रामानुज के सिद्धान्त या आचार-मीमांसा में मानसिक भक्ति तथा व्यवहार शुद्धि पर भी विशेष बल दिया गया है । उन्होंने अपने ग्रन्थों में वैष्णवों के लिए पंचकालोपासना का विधान किया है । उन्होंने दान देने को सर्व श्रेष्ठ कर्म कहा है । उन्होंने बताया कि अपने द्रव्य को दूसरे की सम्पत्ति बना देने तक का त्याग ही ”दान” है । उन्होंने भक्ति के सात सोपान बताए जिन पर चलते हुए भगवान की विशेष कृपा भी प्राप्त हो जाती है ।।

अंत में जब उनके परमधाम गमन का समय आ गया, तो उनका शरीर कृषकाय हो चुका था । फिर भी वे शिष्यों सहित कावेरी तक पहुंच गए । अंतिम समय में भी उन्होंने नित्य-नैमित्तिक कृत्यों को करने की सदाचारमय महत्वपूर्ण शिक्षा दी । उनका जन्म ई. 1017 में हुआ और ब्रह्मलीन हुए 1137 में एक सौ बीस वर्ष तक अपनी सांसारिक यात्रा सम्पन्न करके वे परमधाम को प्रस्थान कर गए ।।

उत्तर भारत के गुरुपरंपरा के बहुत से प्रसिद्द आचार्यों में आचार्य श्रीमद्विश्वक्सेनाचार्य जगदाचार्य श्री त्रिदंडी स्वामी जी महाराज रहे हैं । जिनके द्वारा बहुत से वैष्णव धाम, मंदिर और आचार्य बनाये गए तथा वैष्णव धर्म को प्रसारित किया गया ।।

श्री श्री त्रिदंडी स्वामीजी महाराज ने ७४ चातुर्मास यज्ञ किये थे, और उनके द्वारा कृत ऐसे साधारण लक्ष्मीनारायण महायज्ञों कि संख्या सैकड़ों में है । उत्तर भारत में वैष्णव धर्म का विस्तार श्री त्रिदंडी स्वामी जी महाराज ने किया । भगवान शेषजी के ही अन्य पार्षद, श्रीमद विष्वक्सेन त्रिदंडी स्वामी जी के रूप में अवतरित हुए थे, और उत्तर भारत समेत सम्पूर्ण धरा पर वैष्णव धर्म का प्रचार किया ।।

श्री श्री त्रिदंडी स्वामी जी महाराज, वेदों के अद्भुत विद्वान् एवं प्रखर वक्ता थे । जिन्होंने शास्त्रार्थ में किसी को भी नहीं बख्सा । लेकिन अपने उग्र स्वभाव और धर्म के प्रति कट्टरता के वजह से, उन्होंने धार्मिक समाज में अपनी एक अगल ही पहचान बनायीं थी । भगवान स्वयं उनकी सेवा करने को आते थे । नैष्ठिक बालब्रह्मचारी, १०० ग्राम से भी कम गाय का दूध अल्पाहार के रूप में लेते थे । अद्भुत तेज से संपन्न और अपना त्रिदंड जिसपर भी गिराते उसका कल्याण हो जाता था । आज भी उनके त्रिदंड से मार खाकर जिन लोगों का कल्याण हुआ है, वो उनके जाने के वर्षों बाद भी, उनके पैरों के निचे की मिटटी उठाकर, घर लाकर पूजते हैं ।।

लेकिन भारत की आजादी और महात्मा गाँधी का धर्म निरपेक्षता की उद्घोषणा ने इन विधर्मियों को आजादी दे दी । जिसके वजह से शास्त्रार्थ तो होता, सबको हरा भी दिया जाता था, लेकिन दण्डित करने का अधिकार समाप्त हो गया । जिसका परिणाम आज वैदिक सनातन धर्म की स्थिति के रूप में आपके सामने है । फिर भी प्रातः स्मरणीय पूज्य पाद श्री त्रिदंडी स्वामी जी, ने अपनी उग्रता को बरकरार रखते हुए ही वैष्णव धर्म को लक्ष्मी नारायण यज्ञों के माध्यम से तथा अपने उपदेशों के माध्यम से जीवित रखा ।।

 

 

१०० वर्षों से अधिक इस धरा-धाम पर वैष्णव धर्म को प्रसारित करते हुए । काशी के शिवपुर नामक ग्राम में लक्ष्मी नारायण महायज्ञ के दौरान ही स्वामी जी ने कहा की लक्ष्मीप्रपन्न को बुलाओं और सभी वैष्णवाधिराज लोग ये सोंचते ही रह गए की स्वामी जी, का उत्तराधिकार हमें मिलेगा । इतने में ही स्वामी जी ने श्री श्री १००८ श्री लक्ष्मीप्रपन्न जियर स्वामी जी को बुलाया, और अपना उत्तराधिकार तथा अपनी गद्दी तथा अपना सम्पूर्ण वर्चस्व सौप दीं, और साथ ही सबको निर्देश दिया की तुमलोग कहते थे, न की स्वामी जी आपकी उग्रता से डर लगता है । लेकिन अब तुमलोगों को मेरा सौम्य रूप देखने को मिलेगा जियर स्वामी के रूप में, और ब्रह्मलीन हो गए ।।

।। नमों नारायण ।।

Swami Dhananjay Maharaj

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